मिलन-माधुरी · पद 57
सखी! मैं, लुटि गइ कुंज मझार।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: sakhī! maiṁ, luṭi gai kuñja majhāra
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1सखी! मैं, लुटि गइ कुंज मझार।
2ना जाने का कै गयो मो पै, जादूगर सरदार।
3सुधि बुधि भूलि गई अपनीहूँ, करु कछु द्रुत उपचार।
4इक पल महँ ह्वै गयो प्रलय जनु, तन मन गइ सब हार।
5कासों कहा कहूँ सखि! निज कर, निज गर फाँसी डार।
6पूछत नाउँ “कृपालु” कौन सो, सखि कह,"नंदकुमार"॥
हिन्दी भावार्थ
एक सखी अपनी अन्तरंग सहेली से कहती है कि अरी सखी! आज मैं कुंज में लुट गयी। किसी महान जादूगर ने मेरे ऊपर न जाने क्या कर दिया। कहाँ तक कहूँ, मैं अपनी सुधि भी भूल गयी। अब इसका शीघ्र ही कुछ उपचार कर। एक पल में ही प्रलय-सी हो गयी और मैं अपना सर्वस्व हार गयी। अब मैं किसी से क्या कहूँ जब कि मैंने अपने ही हाथों अपने गले में फाँसी लटका ली। 'कृपालु'पूछते हैं अरी सखी! उस जादूगर का नाम तो बता। सखी ने कहा उसका नाम नंदकुमार है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 608