लोड हो रहा है…लोड हुँदैछ…
Skip to main content
RADHEY RADHEY

मिलन-माधुरी · पद 38

मो पै कछु कै गयो नंदकुमार।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: mo pai kachhu kai gayo nandakumāra

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1मो पै कछु कै गयो नंदकुमार।

2नैनन-नैनन ही भई बातें, जब नैना भये चार।

3हौं भोरी कछु जानि न पाई, ठग्यो नैन ठगहार।

4तन-मन-प्रान हारि दृग रोवत, पोवत अँसुवनहार।

5हेली! भई पहेली, नैनन, हाँसी फाँसी डार।

6धरु “कृपालु” उर धीर, मिटै नहिं, विधि जो लिखा लिलार॥

हिन्दी भावार्थ

(एक सखी का प्रियतम श्यामसुन्दर से प्रथम मधुर मिलन एवं उसका अपनी सखी से कहना!) अरी सखी! आज तो मेरे ऊपर नन्दकुमार ने जादू-सा कर दिया है। जब मेरी आँखें प्रियतम की आँखों से मिलीं, तब उनमें परस्पर कुछ बातें हुई। मैं भोली-भाली कुछ भी न समझ पायी एवं उन आँखों ने मुझे ठग लिया। अब मेरी आँखें तन मन, प्राण सभी-कुछ खोकर आँसुओं की माला पहनाती हुई रो रही हैं। अरी सखी! यह आँखों की हँसी एक समस्या बन गयी है एवं उसने मुझे फाँसी पर लटका दिया है। 'कृपालु बड़े विनोद भरे शब्दों में कहते हैं कि अरी सखी! जो हो गया सो हो गया, अब धैर्य धारण कर। ब्रह्मा ने जो ललार में लिख दिया है वह होकर ही रहेगा।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 592