मिलन-माधुरी · पद 39
मोहिं मोहि लियो निरमोहिया।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: mohiṁ mohi liyo niramohiyā
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1मोहिं मोहि लियो निरमोहिया।
2इक दिन जाति रही गहवर-वन,मारग मिलि गयो सो पिया।
3मोते कही"अरी ओ गूजरि! मन मेरो हरि क्योँ लिया?।
4हौं इकली रहि कहा करूँ सखि! पिय मन-भायो सो किया।
5अब सोइ दरस-परस पुनि चाहत, चैन न इक छिन को जिया।
6कह “कृपालु” सो अस छलिया जेहि, बचि आवे अस को तिया॥
हिन्दी भावार्थ
(एक गोपी का गोपीनाथ से प्रथम मधुर मिलन एवं उसका अपनी अन्तरंग सखी से प्रकट करना।) अरी सखि! उस निर्मोही मनमोहन ने मेरा मन बरबस मोहित कर लिया। एक दिन की बात है, मैं गह्वर-वन जा रही थी, वह मार्ग में ही मिल गया एवं पुकार कर मुझसे बोला-''अरी ओ सखि! तूने मेरा मन क्यों चुरा लिया है?''मैं अकेली थी, क्या करती उसने जो मन में आया वही किया। अब उसका वही दर्शन और वही स्पर्श पुनः चाहती हूँ। एक क्षण के लिए भी चित्त में चैन नहीं है। 'कृपालु' कहते हैं-अरी सखि! वह ऐसा छलिया है जिससे बचकर कोई भी स्त्री नहीं आ सकती भले ही वह ब्रह्माणी, रुद्राणी आदि कोई हो।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 592-593