मिलन-माधुरी · पद 37
मन मोहि लियो मनमोहना।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: mana mohiṁ liyo manamohanā
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1मन मोहि लियो मनमोहना।
2बरजी सखी, जाहु जनि तहँ कहुँ, मन-मोहन मन मोह ना।
3पुनि सोइ कही, जाहु जो तो सखि!, नैनन मोहन जोह ना।
4हौं नहिं मानी, किय मनमानी, जानी नहिं अस सोहना।
5लखतहिं भई विकल उत, इत यह, डर कहुँ होय बिछोह ना।
6धरु “कृपालु” उर धीर, निराशा, प्रेम माहिं सखि! सोह ना॥
हिन्दी भावार्थ
एक सखी कहती है कि मनमोहन ने मेरे मन को हर लिया। क्या बताऊँ मेरी सखी ने मुझे रोका था कि मनमोहन के पास न जाना, नहीं तो वे मन को मोहित कर लेंगे। उसी सखी ने यह भी कहा था अगर जाना भी तो आँखों से मोहन को न देखना। मैंने उसकी बात नहीं मानी, मनमानी की। मुझे स्वप्न में भी यह ध्यान नहीं था कि इतना सुन्दर भी कोई हो सकता है। अब देखते ही मैं घायल हो गयी। साथ ही यह भय उत्पन्न हो गया कि कहीं वियोग न हो जाय। 'कृपालु' कहते हैं कि अरी सखि! धीरज धरो। प्रेम में निराशा अशोभनीय है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 591-592