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RADHEY RADHEY

मिलन-माधुरी · पद 36

मनमोहन-छवि मन भा गई।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: manamohana-chhavi mana bhā gaī

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1मनमोहन-छवि मन भा गई।

2कालि लखी सखि! साँवरि-सूरति, लखतहिं सुरति समा गई।

3जेहि निधि कहँ खोजति रहि अब लौं, सो निधि हौं सखि! पा गई।

4अब सोइ मन-मोहन-मोहिनि-छवि, रोम रोम महँ छा गई।

5चितवनि-चपल मधुर-मृदु-मुसकनि, प्रेम सुधा बरसा गई।

6फूली फिरति “कृपालु” कहत क्योँ, सखि तू धोखा खा गई॥

हिन्दी भावार्थ

एक सखी अपनी अन्तरंग सखी से कहती है अरी सखि! मनमोहन की सुन्दर छवि ने मेरे मन को मोहित कर लिया। कल जैसे ही मैंने श्यामसुन्दर की साँवरी सूरत देखी वैसे ही दीवानी हो गयी। जिस अमूल्य निधि को मैं अनादिकाल से खोज रही थी उसे बिना मूल्य के कल पा गयी। मनमोहन की वह मोहिनी छवि अब हमारे रोम-रोम में समा गयी है। उनकी चंचल चितवन एवं मीठी मुस्कान ने मुझे प्रेम-रस रा कर लिया। 'कृपालु' कहते हैं अरी सखि! तूने अभी मिलन के आनन्द का अनुभव किया है, इसलिए फूली-फूली घूम रही है। तुझे वियोग का अनुभव नहीं है। सच तो यह है कि तू धोखा खा गयी है।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 590-591