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RADHEY RADHEY

मिलन-माधुरी · पद 35

भटू! मैं, पटू लटू भइ आज।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: bhaṭū! maiṁ, paṭū laṭū bhai āja

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1भटू! मैं, पटू लटू भइ आज।

2परम चतुर मोहूँ कहँ छलिया, लूटि लियो ब्रजराज।

3जित देखूँ तित सोइ सोइ दीखत, गई भाज सब लाज।

4इत कुमारि, उत जार प्रीति सखि!, परी शीश जनु गाज।

5बीछी-सी तनु विष बगरावत, विरह साजि निज साज।

6औषधि जान “कृपालु” लाउ जो, रसिकन को सरताज॥

हिन्दी भावार्थ

र एक सखी अपनी अन्तरंग सखी से कहती है- अरी सखी! मैं परम चतुर होकर भी आज लट्टू हो गयी। छलिया श्यामसुन्दर ने मुझको भी लूट लिया। अब जिधर भी देखती हूँ मुझको वही दिखाई पड़ता है। स्त्री स्वभाव सिद्ध लज्जा भी चली गयी। एक ओर तो मैं अविवाहिता कुमारी एवं दूसरी ओर परपुरुष का प्रेम! यह जटिल समस्या मेरे सिर पर वज्रपात के समान आ पड़ी है। विरह भी सजधज के साथ बिच्छू के विष के समान विष फैला रहा है। 'कृपालु' कहते हैं कि यदि तू ले आवे तो मैं औषधि बता सकता हूँ। यदि रसिकशिरोमणि श्यामसुन्दर का मधुर मिलन हो जाये तो यह विष उतर सकता है।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 589-590