मिलन-माधुरी · पद 34
भई री मैं तो, घायल नैनन बान।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: bhaī rī maiṁ to, ghāyala nainana bāna
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1भई री मैं तो, घायल नैनन बान।
2जाति रही सखियन सँग सजनी! जमुना तट असनान।
3तहँ औचक मुरली वारे ने, टेरी मुरलिहिं तान।
4सुनतहिं तान न भान रह्यो मोहिं, बरबस तन मन प्रान।
5तब हौं लख्योँ विवस रस बस ह्वै, सुंदर श्याम सुजान।
6अब “कृपालु” कैसे निबहेगी, लोक वेद कुल कान॥
हिन्दी भावार्थ
एक सखी अपनी अन्तरंग सखी से कहती है कि अरी सखी! मैं तो श्यामसुन्दर के नैनों के बाण से घायल हो गयी। मैं कल यमुना के किनारे सखियों के साथ नहाने जा रही थी, वहीं पर सहसा श्यामसुन्दर ने सुरीली मुरली की तान छेड़ दी। तान सुनते ही अपना सर्वस्व खो बैठी एवं प्रेम रस विभोर होकर श्यामसुन्दर को देखने लगी। तभी उन्होंने कटाक्षपात् द्वारा मुझे घायल कर दिया। 'कृपालु' कहते हैं कि यह तो जो हुआ सो हुआ किन्तु अब लोक वेद एवं कुल की मर्यादाओं का क्या होगा?
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 589