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RADHEY RADHEY

मिलन-माधुरी · पद 33

व्याध इक, मारेहु हिरणिहिं बान।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: vyādha ika, mārehu hiraṇihiṁ bāna

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1व्याध इक, मारेहु हिरणिहिं बान।

2प्रथम सुनाई मधुर सुरन सोँ, वेनु रसीली तान।

3सुनत विभोर भई हिरणी तब, मार्यो तानि कमान।

4हिरणी गिरी धरणि जब घायल, व्याध मंद मुसकान।

5अब हिरणी पल-पल तलफति सखि! करु उपाय जो जान।

6हौं “कृपालु” जानत तू हिरणी, व्याधहुँ श्याम सुजान॥

हिन्दी भावार्थ

एक सखी अपनी अन्तरंग सखी से कहती है अरी सखि! एक बहेलिये ने एक हिरणी को बाण मार दिया। सर्वप्रथम तो उस बहेलिये ने रसीली मुरली की तान सुनाई, पुनः हिरणी के विभोर हो जाने पर धनुष तानकर बाण मार दिया। हिरणी पृथ्वी पर घायल होकर गिर पड़ी। तब बहेलिया मुस्कराने लगा। अब वही हिरणी प्रतिक्षण तड़प रही है। अगर तू कुछ उपाय जानती हो तो कर। 'कृपालु' के शब्दों में सखि उत्तर देती है कि अरी सखि! मैं सब जानती हूँ, वह हिरणी तू ही है और वह व्याध श्यामसुन्दर ही हैं।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 588