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RADHEY RADHEY

मिलन-माधुरी · पद 32

बसे रे मेरे, नैनन पिय! तेरे नैन।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: base re mere, nainana piya! tere naina

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1बसे रे मेरे, नैनन पिय! तेरे नैन।

2नैनन को नहिं डर पिय! उतनो, डर उन नैनन-सैन।

3पुनि सैननहूँ डर नहिं उतनो, डर उन सैनन पैन।

4जब चह सैन निकारन दृग कह, पैन किंतु सुख-दैन।

5अब नैनन करकत तिन छिन-छिन, चैन न मोहिं दिन-रैन।

6कह “कृपालु” यह रोग लाग जेहि, कैसेहुँ कबहुँ छुटै न॥

हिन्दी भावार्थ

(एक सखी का श्यामसुन्दर से विनोद भरा प्रवचन-) हे प्रियतम! मेरी आँखों में तुम्हारी आँखें बस गयी हैं। आँखों के बसने का उतना भय नहीं है जितना भय आँखों के कटाक्ष का है। और फिर उन आँखों के कटाक्षों के बस जाने का भी उतना दुःख नहीं है जितना दुःख उनके नुकीले होने का है। समस्या यह है कि जब मैं आँखों से उन तीखे कटाक्षों को निकालना चाहती हूँ, तब आँखें कहती हैं-ऐसा भूलकर मत ड। वे कटाक्ष तीखे अवश्य हैं किन्तु साथ ही उनमें अनन्त आनन्द भरा हुआ है। अब मेरी आँखों में वे कटाक्ष प्रतिक्षण चुभ रहे हैं, एक क्षण को भी चैन नहीं है। 'कृपालु' कहते हैं कि यह असाध्य रोग जिसे लग जाता है वह कभी भी, किसी प्रकार भी उससे छुटकारा नहीं पा सकता।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 587-588