# बसे रे मेरे, नैनन पिय! तेरे नैन।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0615-M15-K032
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: मिलन-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 32
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 289–290

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>बसे रे मेरे, नैनन पिय! तेरे नैन।  
<a id="line-2"></a>नैनन को नहिं डर पिय! उतनो, डर उन नैनन-सैन।  
<a id="line-3"></a>पुनि सैननहूँ डर नहिं उतनो, डर उन सैनन पैन।  
<a id="line-4"></a>जब चह सैन निकारन दृग कह, पैन किंतु सुख-दैन।  
<a id="line-5"></a>अब नैनन करकत तिन छिन-छिन, चैन न मोहिं दिन-रैन।  
<a id="line-6"></a>कह “कृपालु” यह रोग लाग जेहि, कैसेहुँ कबहुँ छुटै न॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

(एक सखी का श्यामसुन्दर से विनोद भरा प्रवचन-) हे प्रियतम! मेरी आँखों में तुम्हारी आँखें बस गयी हैं। आँखों के बसने का उतना भय नहीं है जितना भय आँखों के कटाक्ष का है। और फिर उन आँखों के कटाक्षों के बस जाने का भी उतना दुःख नहीं है जितना दुःख उनके नुकीले होने का है। समस्या यह है कि जब मैं आँखों से उन तीखे कटाक्षों को निकालना चाहती हूँ, तब आँखें कहती हैं-ऐसा भूलकर मत ड। वे कटाक्ष तीखे अवश्य हैं किन्तु साथ ही उनमें अनन्त आनन्द भरा हुआ है। अब मेरी आँखों में वे कटाक्ष प्रतिक्षण चुभ रहे हैं, एक क्षण को भी चैन नहीं है। 'कृपालु' कहते हैं कि यह असाध्य रोग जिसे लग जाता है वह कभी भी, किसी प्रकार भी उससे छुटकारा नहीं पा सकता।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 587-588

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## पद का स्रोत और उद्धरण

पद और उपलब्ध भावार्थ दिए गए स्रोत से लिप्यंतरित पाठ हैं। उद्धरण में स्रोत के शब्द, विराम-चिह्न और क्रम सुरक्षित रखें; लोप को स्पष्ट चिह्नित करें। सारांश या व्याख्या को अलग से अपना भावानुवाद बताकर इसी पद का संदर्भ दें। स्रोत में पूरे पद का भावार्थ है, शब्द-दर-शब्द या पंक्ति-दर-पंक्ति अर्थ नहीं। लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं।

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
