निकुंज-माधुरी · पद 16
प्रेम रस, बरसत कुंज मझार।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: prema-rasa, barasata kuñja majhāra
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1प्रेम रस, बरसत कुंज मझार।
2शरद चंद्र, उत्फुल्ल-मल्लिका, ऋतु बसंत रिझवार।
3मधुर मुरलि-धुनि सुनि सनकादिक, दीन समाधि बिसार।
4भृकुटि-लता-विभ्रम करि नाचत, सखियन यूथ अपार।
5मधुर-सुरन सोँ तान अलापति, गावति राग मलार।
6भजु “कृपालु” मन लाल लाड़ली, जो चह रास-विहार॥
हिन्दी भावार्थ
कुंज के बीच में युगल सरकार के द्वारा प्रेमरस की विच्छिन्न वृष्टि हो रही है। शरद्कालीन पूर्णिमा का चन्द्रमा खिला हुआ है, एवं वसंत-कालीन मल्लिका आदिक फूल फूले हुये हैं! श्यामसुन्दर की मधुर मुरली की धुनि सुनकर कर, एवं सनकादिकों ने भी अपनी निर्विकल्प समाधि भुला दी है। गोपियों का झुण्ड भौंहों से कटाक्षपात करते हुए युगल सरकार के साथ नाच रहा है। श्यामा-श्याम के साथ समस्त खियाँ मधुर स्वरों से तान एवं आलाप लेती हुई मल्हार राग रही हैं। 'कृपालु' कहते हैं कि ओ मन! तू भी यदि उपर्युक्त रास-विहार चाहता है, तो श्यामा-श्याम की शरण होकर उन्हीं का बन जा।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 549-550