निकुंज-माधुरी · पद 17
बलि जाउँ निकुंज लतान की।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: bali jāuṁ nikuñja-latāna kī
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1बलि जाउँ निकुंज लतान की।
2अलि-कुल-संकुल विपुल-सुफूलनि, लतनि तरुनि लिपटान की।
3नैन-कुरंग-तरंग तरंगिणि, कुँवरि भूप वृषभान की।
4रति-रस-सरस-केलि-रस-लंपट, सुंदर श्याम सुजान की।
5मणि-गण किरण-कदंबनि भूषण, दामिनि दुति उनमान की।
6लखत “कृपालु” अनूपम जोरी, प्रेम-सुधा-रस-खान की॥
हिन्दी भावार्थ
मैं विविध प्रकार की लताओं के कुंजों की बार-बार बलैया लेता हूँ। मैं वृक्षों में लिपटी हुई लता एवं लताओं में फूले हुए विविध प्रकार के फूल तथा फूलों पर मँडराते हुए भौरों के झुँडों की बार-बार बलैया लेता हूँ। मृगों के नेत्रों के समान चंचल तरंगों से युक्त मृगनयनी वृषभानुनन्दिनी की बार-बार बलैया लेता हूँ। लोकातीत प्रेम की अन्तरंग लीलाओं के माधुर्य में उन्मत्त रसिक-शिरोमणि श्यामसुन्दर की बलैया लेता हूँ। अंधकार में भी विविध प्रकार की मणियों से जटित गहनों के प्रकाश की बिजली के समान चमक की बार-बार बलैया लेता हूँ। 'कृपालु' कहते हैं कि प्रेम के अमृत के रस की सार-स्वरूपा प्रिया-प्रियतम की अनोखी जोड़ी को देखते हुए बार-बार बलिहार जाता हूँ।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 550-551