निकुंज-माधुरी · पद 15
परो सखि, झूलन में झगरो।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: paro sakhi, jhūlana meṁ jhagaro
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1परो सखि, झूलन में झगरो।
2रतन खचित चंदन को झुलना, यमुना पुलिन परो।
3ललिता कहीं,"चलो झूलन कहँ, दोउ ठाकुर हमरो"।
4कह्यो लाल"लाड़लिहिं झुलावें, नहिं हौं रहत खरो"।
5कह्यो लाड़लिहुँ"लाल झुलावें", वचन गुमान भरो।
6तब “कृपालु” कह हरि ते"तुम कत, आजुहिं नई करो"॥
हिन्दी भावार्थ
अरी सखी! आज श्यामा-श्याम के झूला झूलने झगड़ा पड़ गया। जब रतन खचित चन्दन का झूला यमुना र किनारे कदम्ब में पड़ गया तो ललिता सखी ने कहा हम दोनों सरकार झूलने के लिए पधारें। झूले के पास पहुँचव श्यामसुन्दर ने कहा आज तो श्री किशोरी जी ही झुलायेंगी त हम झूलेंगे अन्यथा खड़े रहेंगे। इसी प्रकार श्री किशोरी जी कहा कि श्यामसुन्दर ही झुलावें तब हम झूलें। 'कृपालु झगड़े को निपटाने के लिए ठाकुर जी से कहा कि तुम आः ही यह नयी बात क्यों कर रहे हो??
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 549