निकुंज-माधुरी · पद 7
खेलत श्याम संग श्यामा के,
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: khelata shyāma saṅga shyāmā ke, āṁkha-michaunī kuñja majhārī
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1खेलत श्याम संग श्यामा के,
2आँख मिचौनी कुंज मझारी।
3चलि न चातुरी अलि-छल-बल बँधि,
4दृगन बँधावत हारि बिहारी।
5प्रेम-सिंधु चह सुधि-बुधि बोरन,
6द्रुत युग-दृग पट बाँधति प्यारी।
7उत कर-परस पाइ पुलकित तनु,
8"सूर-श्याम"निज सुरति बिसारी।
9ज्यों आतम-अवराधक ज्ञानी,
10निज-स्वरूप खोजत उर धारी।
11त्यों ही निज-स्वरूप श्रीजू को,
12खोजत आजु ब्रह्म बनवारी।
13या बांकी-झाँकी झांकन को,
14ब्रह्मलीन जन नहिं अधिकारी।
15हेरत, हार मानि हरि टेरत,
16दरस दिखाओ भानुदुलारी।
17येहि विधि दीन-पुकार कीन जब,
18दीनबंधु प्रणतारति-हारी।
19"सूर ब्रह्म"को दृगपट खोलति,
20श्रीजू पर “कृपालु” बलिहारी॥
हिन्दी भावार्थ
श्री श्यामसुन्दर किशोरी जी के साथ सखियों को कर कुंजों के बीच में आँख मिचौनी खेल रहे हैं। प्चौनी में पहले किसी भी नियम के अनुसार एक चोर बनाया गाता है एवं उसी की आँखों पर पट्टी बाँधी जाती है। श्यामसुन्दर भी सखियों के छल में अपनी समस्त चातुरी लकर हारे हुए अपनी आँखों पर पट्टी बँधा रहे हैं। गी दोनों हाथों से शीघ्रतापूर्वक पट्टी बाँध रही हैं। प्रयतम की आँखों के स्पर्श से प्रेम का समुद्र उमड़ता हुआ कशोरी जी की सुधि-बुधि खोना चाहता है। गी किशोरी जी के मृदुल हाथों के स्पर्श से रोमांचित होते हुए पनी सुधि-बुधि भूल रहे हैं। का उपासक ज्ञानी अपनी आत्मा को साधन बल से खोजता है उसी प्रकार ब्रह्म परमात्मा श्रीकृष्ण भी अपनी आत्मास्वरूप किशोरी जी को बिना आँखों के ही खोज रहे हैं। झाँकी को देखने का अधिकारी ब्रह्मलीन परमहंस भी नहीं है वह तो केवल रसिकों को ही सुलभ है। हार गये तब दीन बनकर पुकारने लगे, 'हे किशोरी जी! दर्शन दो।'दीनों की पुकार सुनने वाले एवं उनके कष्टों क हरण करने वाले ब्रह्म श्रीकृष्ण ने जब इस प्रकार दीनों क भाँति साधनहीन बनकर किशोरी जी को पुकारा तब, "कृपालु कहते हैं कि उन आँखहीन श्यामसुन्दर-ब्रह्म के पट्टी रूप आवरण को हटाकर उन्हें वास्तविक आँखें प्रदान करती हु किशोरी जी पर कृपालु बलि-बलि जाते हैं।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 541-543