# खेलत श्याम संग श्यामा के,

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0561-M14-K007
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: निकुंज-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 7
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 264–265

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>खेलत श्याम संग श्यामा के,  
<a id="line-2"></a>आँख मिचौनी कुंज मझारी।  
<a id="line-3"></a>चलि न चातुरी अलि-छल-बल बँधि,  
<a id="line-4"></a>दृगन बँधावत हारि बिहारी।  
<a id="line-5"></a>प्रेम-सिंधु चह सुधि-बुधि बोरन,  
<a id="line-6"></a>द्रुत युग-दृग पट बाँधति प्यारी।  
<a id="line-7"></a>उत कर-परस पाइ पुलकित तनु,  
<a id="line-8"></a>"सूर-श्याम"निज सुरति बिसारी।  
<a id="line-9"></a>ज्यों आतम-अवराधक ज्ञानी,  
<a id="line-10"></a>निज-स्वरूप खोजत उर धारी।  
<a id="line-11"></a>त्यों ही निज-स्वरूप श्रीजू को,  
<a id="line-12"></a>खोजत आजु ब्रह्म बनवारी।  
<a id="line-13"></a>या बांकी-झाँकी झांकन को,  
<a id="line-14"></a>ब्रह्मलीन जन नहिं अधिकारी।  
<a id="line-15"></a>हेरत, हार मानि हरि टेरत,  
<a id="line-16"></a>दरस दिखाओ भानुदुलारी।  
<a id="line-17"></a>येहि विधि दीन-पुकार कीन जब,  
<a id="line-18"></a>दीनबंधु प्रणतारति-हारी।  
<a id="line-19"></a>"सूर ब्रह्म"को दृगपट खोलति,  
<a id="line-20"></a>श्रीजू पर “कृपालु” बलिहारी॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

श्री श्यामसुन्दर किशोरी जी के साथ सखियों को कर कुंजों के बीच में आँख मिचौनी खेल रहे हैं। प्चौनी में पहले किसी भी नियम के अनुसार एक चोर बनाया गाता है एवं उसी की आँखों पर पट्टी बाँधी जाती है। श्यामसुन्दर भी सखियों के छल में अपनी समस्त चातुरी लकर हारे हुए अपनी आँखों पर पट्टी बँधा रहे हैं। गी दोनों हाथों से शीघ्रतापूर्वक पट्टी बाँध रही हैं। प्रयतम की आँखों के स्पर्श से प्रेम का समुद्र उमड़ता हुआ कशोरी जी की सुधि-बुधि खोना चाहता है। गी किशोरी जी के मृदुल हाथों के स्पर्श से रोमांचित होते हुए पनी सुधि-बुधि भूल रहे हैं। का उपासक ज्ञानी अपनी आत्मा को साधन बल से खोजता है उसी प्रकार ब्रह्म परमात्मा श्रीकृष्ण भी अपनी आत्मास्वरूप किशोरी जी को बिना आँखों के ही खोज रहे हैं। झाँकी को देखने का अधिकारी ब्रह्मलीन परमहंस भी नहीं है वह तो केवल रसिकों को ही सुलभ है। हार गये तब दीन बनकर पुकारने लगे, 'हे किशोरी जी! दर्शन दो।'दीनों की पुकार सुनने वाले एवं उनके कष्टों क हरण करने वाले ब्रह्म श्रीकृष्ण ने जब इस प्रकार दीनों क भाँति साधनहीन बनकर किशोरी जी को पुकारा तब, "कृपालु कहते हैं कि उन आँखहीन श्यामसुन्दर-ब्रह्म के पट्टी रूप आवरण को हटाकर उन्हें वास्तविक आँखें प्रदान करती हु किशोरी जी पर कृपालु बलि-बलि जाते हैं।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 541-543

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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