निकुंज-माधुरी · पद 6
किशोरी सँग, नाचत नवल किशोर।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: kishorī saṁga, nāchata navala kishora
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1किशोरी सँग, नाचत नवल किशोर।
2लली लाल मंडल बिच राजत, ललितादिक चहुँ ओर।
3इक ते इक संगीत निपुन सखि, गावति प्रेम-विभोर।
4बजत वाद्य बहु विधि पुनि कंकन, किंकिनि नूपुर सोर।
5ता थेइ, ता थेइ, थेइ करि निरतत, बहु विधि अंग मरोर।
6लेत अलाप “कृपालु” लाल पै, तान लली बरजोर॥
हिन्दी भावार्थ
श्री वृषभानुकिशोरी के साथ श्री नन्दकिशोर नाच रहे हैं। श्यामा-श्याम मण्डल के बीच में खड़े हैं एवं चारों ओर ललितादिक सहस्रं सखियाँ खड़ी हैं। गायन-कला में निपुण ब्रजांगनाएँ प्रेम-विभोर होकर अनेक राग गा रही हैं। अनेक प्रकार के बाजे बज रहे हैं एवं सब के शरीर से कंकण, किंकिण एवं नूपुर की ध्वनि हो रही है। अपने अंगों को मरोड़ते हुए ता थेइ, ता थेइ, थेइ करते हुए नाच रहे हैं। कृपालु' कहते हैं कि श्यामसुन्दर यद्यपि मधुर आलाप ले रहे हैं तथापि लाड़िली जी की तान की मधुरिमा कुछ और ही है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 541