लोड हो रहा है…लोड हुँदैछ…
Skip to main content
RADHEY RADHEY

निकुंज-माधुरी · पद 8

चलो पिय, झूलें कुंज मझार।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: chalo piya, jhūleṁ kuñja majhāra

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1चलो पिय, झूलें कुंज मझार।

2मनभावन वृंदावन, सावन, रस बरसावन-हार।

3देखि अंबराडंबर, अंबर, दामिनि दमक निहार।

4प्यारी को संकेत जानि कह, रसिकन को रिझवार।

5दमकनि दामिनि देखि, देखु घन, गरजत जनु बलिहार।

6सुनि “कृपालु” संकेत लली कह, मृदु मुसकाय"लबार"॥

हिन्दी भावार्थ

श्री किशोरी जी श्री श्यामसुन्दर से कहती हैं कि हे प्रियतम! चलो कुंज में झूला झूलें। देखो प्रियतम! वृन्दावन की क्या मनोहर झाँकी है! एवं रस बरसाने वाले सावन मास का क्या सुहावना दृश्य है! आकाश की ओर देखो! आकाश में काले बादलों को देखकर बिजली कैसी चमक रही है (संकेत यह है कि तुमको देखकर मेरा भी मन हिलोरें ले रहा है)। किशोरी जी के सांकेतिक शब्दों के अर्थ को जानकर श्यामसुन्दर ने कहा कि हे किशोरी जी! देखो तो! आकाश में चमचमाती हुई बिजली को देख कर गरजते हुए बादल किस प्रकार आनन्द विभोर होने का परिचय दे रहे हैं। संकेत यह है कि तुमको देखकर मैं विभोर हो रहा हूँ। 'कृपालु' कहते हैं कि श्यामसुन्दर के इन सांकेतिक शब्दों के अर्थ को समझकर मधुर मुस्कान से युक्त होकर किशोरी जी ने कहा 'लबरा कहीं के'।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 543-544