लीला-माधुरी · पद 4
""अरी ओ, मनहारिनि मनिहार।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: “arī o! manahārini mana hāra
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1""अरी ओ, मनहारिनि मनिहार।
2मुनि-मन-हारिनि मनिहारिनि तू, मो मन-हारिनि हार।
3जैसो रूप अनूपम तैसो, भल सोरह श्रृंगार।
4नाँव गाँव है कहा तिहारो?"", पूछति भानुदुलार।
5"प्यारी जू! मम नाँव साँवरी, गोकुल गाँव हमार"।
6"कौन तिहारो प्रियतम साँवरि?","प्रियतम नंदकुमार"।
7पुनि पूछति"पितु मातु कौन तव?", यह सुनि मौनहिं धार।
8हिय ललितहिं कछु शंक भई तब, इकटक ताहि निहार।
9कछु कछु लिय पहिचान कान्ह कहँ, चिर परिचित दृग चार।
10कंचुकि तट कौस्तुभ मणि लखि कह,"यह छलियन सरदार"।
11हँसीं “कृपालु” ललिहुँ लखि लालहिं, मिल्यो युगल सरकार॥
हिन्दी भावार्थ
मनिहारिन का भेष बनाये हुए श्यामसुन्दर से किशोरी के मन को भी हरण करने वाली है। यहाँ तक कि तूने मेरे मन को भी हर लिया। जितना सुन्दर तेरा रूप है उतना ही सुन्दर सोलहों शृंगार भी है। तेरा नाम क्या है एवं तेरा गाँव कौन है? मनिहारिन ने कहा-प्यारी जी, मेरा नाम साँरी सखि है एवं मेरा ग्राम गोकुल है। पुनः किशोरी जी ने पूछा तेरा पति कौन है? मनिहारिन ने उत्तर दिया कि मेरे पति नन्दकुमार हैं। फिर किशोरी जी ने पूछा कि तेरे माता-पिता कौन हैं? इस प्रश्न को सुनते ही मनिहारिन चुप हो गयी। इससे ललिता सखि को कुछ शंका हो गयी। अतएव वे एकटक श्यामसुन्दर को निहारने लगीं। चिर परिचित नेत्र होने के कारण ललिता सखि ने श्यामसुन्दर को कुछ-कुछ पहचान लिया एवं जब स के पास देखा तो कौस्तुभमणि दिखाई पड़ी। फिर क्य था ललिता ने कहा-यह तो छलियों का सरदार श्यामसुन्दर है कृपालु' के शब्दों में श्यामसुन्दर को इस वेश में देखकर किशोरी जी को हँसी आ गयी एवं दोनों का पुनः मिलन हो गया।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 504-505