# ""अरी ओ, मनहारिनि मनिहार।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0526-M12-K004
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: लीला-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 4
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 245–245

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>""अरी ओ, मनहारिनि मनिहार।  
<a id="line-2"></a>मुनि-मन-हारिनि मनिहारिनि तू, मो मन-हारिनि हार।  
<a id="line-3"></a>जैसो रूप अनूपम तैसो, भल सोरह श्रृंगार।  
<a id="line-4"></a>नाँव गाँव है कहा तिहारो?"", पूछति भानुदुलार।  
<a id="line-5"></a>"प्यारी जू! मम नाँव साँवरी, गोकुल गाँव हमार"।  
<a id="line-6"></a>"कौन तिहारो प्रियतम साँवरि?","प्रियतम नंदकुमार"।  
<a id="line-7"></a>पुनि पूछति"पितु मातु कौन तव?", यह सुनि मौनहिं धार।  
<a id="line-8"></a>हिय ललितहिं कछु शंक भई तब, इकटक ताहि निहार।  
<a id="line-9"></a>कछु कछु लिय पहिचान कान्ह कहँ, चिर परिचित दृग चार।  
<a id="line-10"></a>कंचुकि तट कौस्तुभ मणि लखि कह,"यह छलियन सरदार"।  
<a id="line-11"></a>हँसीं “कृपालु” ललिहुँ लखि लालहिं, मिल्यो युगल सरकार॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

मनिहारिन का भेष बनाये हुए श्यामसुन्दर से किशोरी के मन को भी हरण करने वाली है। यहाँ तक कि तूने मेरे मन को भी हर लिया। जितना सुन्दर तेरा रूप है उतना ही सुन्दर सोलहों शृंगार भी है। तेरा नाम क्या है एवं तेरा गाँव कौन है? मनिहारिन ने कहा-प्यारी जी, मेरा नाम साँरी सखि है एवं मेरा ग्राम गोकुल है। पुनः किशोरी जी ने पूछा तेरा पति कौन है? मनिहारिन ने उत्तर दिया कि मेरे पति नन्दकुमार हैं। फिर किशोरी जी ने पूछा कि तेरे माता-पिता कौन हैं? इस प्रश्न को सुनते ही मनिहारिन चुप हो गयी। इससे ललिता सखि को कुछ शंका हो गयी। अतएव वे एकटक श्यामसुन्दर को निहारने लगीं। चिर परिचित नेत्र होने के कारण ललिता सखि ने श्यामसुन्दर को कुछ-कुछ पहचान लिया एवं जब स के पास देखा तो कौस्तुभमणि दिखाई पड़ी। फिर क्य था ललिता ने कहा-यह तो छलियों का सरदार श्यामसुन्दर है कृपालु' के शब्दों में श्यामसुन्दर को इस वेश में देखकर किशोरी जी को हँसी आ गयी एवं दोनों का पुनः मिलन हो गया।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 504-505

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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