लोड हो रहा है…लोड हुँदैछ…
Skip to main content
RADHEY RADHEY

लीला-माधुरी · पद 5

इक आई मालिनि स्वामिनी!।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: ika āī mālini swāminī!

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1इक आई मालिनि स्वामिनी!।

2रूप अनूप लखी सखि जो ही, मोही सो ही भामिनी।

3झूमति झुकति चलति मन भावति, लजवति गति गजगामिनी।

4तनु सोरह श्रृंगार सुशोभित, नख शिख छवि अभिरामिनी।

5श्यामल रंग अंग प्रति अंगनि, वारत रति-पति कामिनी।

6लिये पारिजातादिक फूलनि, माल अनेकन नामिनी।

7लली “कृपालु” कहीं"लै आवहु, कहहु इहैं रह यामिनी"॥

हिन्दी भावार्थ

मालिन भेषधारी श्यामसुन्दर के संकेत से एक सखि किशोरी जी से कहती है कि हे स्वामिनी जू! एक ऐसी मालिन आई है, जिसकी अनुपम छवि को जो भी सखि देखती है वही मोहित हो जाती है। वह झूमती एवं झुकती हुई इतनी सुन्दर गति से चलती है कि मतवाले हाथी की चाल भी लज्जित हो जाती है। वह सोलहों शृंगार से सुशोभित है, वह सर्वांग सुन्दरी है। उसका श्याम रंग है। उसके अंग अंग पर कामदेव अपनी रति को न्यौछावर करता है। वह कल्पवृक्ष आदि फूलों की अनेक नाम वाली माला लिये है। 'कृपालु' कहते हैं कि किशोरी जी ने कहा कि उसको यहीं ले आओ और कहो कि आज रात भर यहीं विश्राम करे।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 505