लीला-माधुरी · पद 6
"कपाटनि, को नटखट खटकाय।"
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: ‘kapāṭani, ko naṭakhaṭa khaṭakāya’
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1"कपाटनि, को नटखट खटकाय।"
2जानि जानि पूछति प्यारी जू, अधरातिन मुसकाय।
3हरि कह,"हौ, माधव,""वसंत तुम, अबहिं न फागुन आय।"
4"हौं चक्रीधर,""हो कुम्हार तो, घट बनाउ कहुँ जाय।"
5"हौ अहि मर्दी,""गरुड़राज! तजि, बैकुण्ठहिं कित धाय।"
6"हौं हौं हरि,""अरि! वानर दैया, हौं न खोलिहौं माय।"
7"हौं घनश्याम","अहौ जो घन तो, नील गगन रहु छाय।"
8"हौं धरणीधर,""अहौ शेष तो, जाहु पताल सिधाय।"
9खोल्यो लली “कृपालु” कपाटहिं, लालहिं बहुत खिझाय॥
हिन्दी भावार्थ
एक दिन आधी रात को श्यामसुन्दर किशोरी जी के पहल के द्वार के पाट को खटखटाने लगे। किशोरी जी यद्यपि ज्ञान गयीं फिर भी विनोद के लिये मन ही मन मुस्कराती हुई पूछने लगीं-कौन नटखट रात को कपाट खटखटा रहा है'? श्यामसुन्दर ने कहा "मैं माधव हूँ'। किशोरी जी ने 'माधव शब्द का बसन्त अर्थ लेते हुए कहा कि अरे ऋतु बसन्त! अभी तुम कैसे आ गये! अभी तो फागुन नहीं आया। फिर श्यामसुन्दर ने कहा 'मैं चक्रोधर हूँ'। किशोरी जी ने कहा अगर तुम कुम्हार हो तो कहीं जाकर मिट्टी के घड़े बनाओ। श्यामसुन्दर ने कहा नहीं नहीं, मैं अहिमदीं हूँ (कालिया नाग नथने वाला) किशोरी जी ने कहा यदि तुम अहि को मारने वाले गरुड़ हो तो बैकुण्ठ छोड़कर यहाँ कैसे आये? पुनः ठाकुरजी ने कहा "मैं हरि हूँ'तब किशोरी जी ने डरने का अभिनय करते हुए कहा अरी दैया! तुम बन्दर हो! हाय मैया!! तब मैं बिल्कुल ही नहीं खोलूँगी। पुनः श्यामसुन्दर ने कहा "मैं तो घनश्याम हूँ। किशोरी जी ने कहा अगर तुम काले बादल हो तो आकाश जाओ, महल में तुम्हारी क्या आवश्यकता है? श्यामसुन्दर कहा अरी राधे! मैं धरणीधर हूँ (भगवान कच्छप) किशोर जी ने कहा अगर तुम शेषनाग हो तो पाताल में जाओ। "कृपालु कहते हैं इस प्रकार श्यामसुन्दर को खूब खिझाकर किशोरी ज ने किवाड़ खोल दिये।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 506-507