लीला-माधुरी · पद 7
गई लखि, दीपावलि बलिहार।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: gaī lakhi, dīpāvali balihāra
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1गई लखि, दीपावलि बलिहार।
2जगमग-जगमग जगमगात गिरि, गोवर्धन रिझवार।
3लखि जाकी बाँकी झाँकी कहँ, दउँ बैकुण्ठहुँ वार।
4इत ललितादि सखिन सँग विहरति, अलबेली सरकार।
5उत मधुमंगलादि सँग क्रीड़त, नागर नंदकुमार।
6निज-निज साज साजि दोउ दल चल, मानसि-गंग मझार।
7इक तट नटखट दल इक तट दल, राजत भानुदुलार।
8दोउ दल निज-निज कनक-दीपकन, डार्यो जल मझधार।
9दोउ कर अँजुरिन जल हलकोरत, दीपन-छवि छविदार।
10झलमलात दोउ दल दीपावलि, हिल-मिल भये इकसार।
11लखि “कृपालु” कह, पुनि-पुनि जय हो, दीपावलि श्रृंगार॥
हिन्दी भावार्थ
अरी सखि! यह दीपावली की झाँकी देखकर मैं तो बलिहार गयी। जलते हुए दीपकों से गोवर्धन-पर्वत जगमग रहा है। जिसकी सुन्दर झाँकी को देखकर मैं बैकुण्ठ को भी न्यौछावर करती हूँ। एक ओर ललितादिक सखियों के साथ किशोरी जी क्रीड़ा कर रही हैं दूसरी ओर मधुमंगल आदि सखाओं के साथ श्यामसुन्दर क्रीड़ा कर रहे हैं। अपने-अपने दल को सजा कर दोनों दल मानसी गंगा पर पहुँचे। मानसी गंगा के तट पर ठाकुर जी का दल एक ओर एवं दूसरी ओर किशोरी जी का दल विराजमान हुआ। दोनों दलों ने अपने अपने स्वर्ण के दीपकों को जलाकर जल में डाल दिया, एवं दोनों दलों ने अपने दोनों हाथों की अंजुलियों से जल को हलकोरना प्रारम्भ किया। वह छवि देखते ही बनती है। झलमलाते हुए दोनों दलों के सहस्रं प्रज्ज्चलित दीपक परस्पर हिल-मिलकर एक हो गये। यह देखकर 'कृपालु' ने कहा 'जय हो! जय हो! जय हो! दीपावलि श्रृंगार की जय हो ''।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 507-508