# गई लखि, दीपावलि बलिहार।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0529-M12-K007
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: लीला-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 7
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 246–247

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>गई लखि, दीपावलि बलिहार।  
<a id="line-2"></a>जगमग-जगमग जगमगात गिरि, गोवर्धन रिझवार।  
<a id="line-3"></a>लखि जाकी बाँकी झाँकी कहँ, दउँ बैकुण्ठहुँ वार।  
<a id="line-4"></a>इत ललितादि सखिन सँग विहरति, अलबेली सरकार।  
<a id="line-5"></a>उत मधुमंगलादि सँग क्रीड़त, नागर नंदकुमार।  
<a id="line-6"></a>निज-निज साज साजि दोउ दल चल, मानसि-गंग मझार।  
<a id="line-7"></a>इक तट नटखट दल इक तट दल, राजत भानुदुलार।  
<a id="line-8"></a>दोउ दल निज-निज कनक-दीपकन, डार्यो जल मझधार।  
<a id="line-9"></a>दोउ कर अँजुरिन जल हलकोरत, दीपन-छवि छविदार।  
<a id="line-10"></a>झलमलात दोउ दल दीपावलि, हिल-मिल भये इकसार।  
<a id="line-11"></a>लखि “कृपालु” कह, पुनि-पुनि जय हो, दीपावलि श्रृंगार॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

अरी सखि! यह दीपावली की झाँकी देखकर मैं तो बलिहार गयी। जलते हुए दीपकों से गोवर्धन-पर्वत जगमग रहा है। जिसकी सुन्दर झाँकी को देखकर मैं बैकुण्ठ को भी न्यौछावर करती हूँ। एक ओर ललितादिक सखियों के साथ किशोरी जी क्रीड़ा कर रही हैं दूसरी ओर मधुमंगल आदि सखाओं के साथ श्यामसुन्दर क्रीड़ा कर रहे हैं। अपने-अपने दल को सजा कर दोनों दल मानसी गंगा पर पहुँचे। मानसी गंगा के तट पर ठाकुर जी का दल एक ओर एवं दूसरी ओर किशोरी जी का दल विराजमान हुआ। दोनों दलों ने अपने अपने स्वर्ण के दीपकों को जलाकर जल में डाल दिया, एवं दोनों दलों ने अपने दोनों हाथों की अंजुलियों से जल को हलकोरना प्रारम्भ किया। वह छवि देखते ही बनती है। झलमलाते हुए दोनों दलों के सहस्रं प्रज्ज्चलित दीपक परस्पर हिल-मिलकर एक हो गये। यह देखकर 'कृपालु' ने कहा 'जय हो! जय हो! जय हो! दीपावलि श्रृंगार की जय हो ''।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 507-508

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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