लीला-माधुरी · पद 8
चलीं ललि, आजु छलन नँदलाल।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: chalīṁ lali, āju chhalana naṁdalāla
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1चलीं ललि, आजु छलन नँदलाल।
2मुकुट मयूर-पुच्छ-गुच्छन सिर, खौरि तिलक दिय भाल।
3दुपटी, पीतपटी, लकुटी कर, गर-गुंजन-वनमाल।
4छूटी लट, कानन कुंडल मुख, मुरली-शब्द रसाल।
5काछनि काछे कटितट अटपट, नटखट सोँ चलि चाल।
6गोरे ग्वाल भानुपुर के बनि, गइँ “कृपालु” ढिंग लाल॥
हिन्दी भावार्थ
(लाडली जी का गोरे ग्वाल का वेश बनाकर श्रीकृष्ण आज किशोरी जी नन्दलाल को छलने जा रही हैं, अतएव मोर के पंखों का मुकुट पहन लिया है एवं ललाट में केसर का तिलक लगा लिया है। पीताम्बर ओढ़े हुए हैं एवं हाथ में लठिया लिए हैं तथा गले में गुंज-माला व वनमाला पहन ली है। अपनी वेणी को खोल दिया है एवं कानों में कुण्डल पहन लिये हैं तथा मधुर मुरली बजा रही हैं। कमर में सुन्दर काछनी काछे हुए हैं एवं नंदलाल की ही चंचल चाल से चल रही हैं इस प्रकार 'कृपालु' कहते हैं कि अपने-आपको बरसाने का ग्वाल कहती हुई किशोरी जी ने नन्दलाल को ठगने के लिए प्रस्थान किया।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 508-509