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RADHEY RADHEY

लीला-माधुरी · पद 9

चले बनि, मालिनि बनमाली।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: chale bani, mālini banamālī

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1चले बनि, मालिनि बनमाली।

2करि सोरह सिंगार धरे सिर, फुलनहार डाली।

3पहुँचे श्री वृषभानु भवन जहँ, अलिन संग लाली।

4टेरि कह्यो मालिनि यह आई, नंदगाम वाली।

5जो ब्रजबाल माल ले आली!, ले निज गल घाली।

6ताको श्याम गुलाम होय लखु, आजुहिं नहिं काली।

7"जाउ बुलाउ ल्याउ,"कह लाली,"सुनु ललिता आली"।

8चली लली के महल अली सँग, मालिनि गति जाली।

9लाल “कृपालु” छली अति लाली, अति भोलीभाली॥

हिन्दी भावार्थ

श्यामसुन्दर ने आज मालिन का भेष बनाया है सोलह शृंगार करके फूलों के हार की डाली सिर पर रखे हुए मालिन बनकर चले एवं श्री वृषभानु के द्वार पर, जहाँ सखियों के साथ किशोरी जी विराजमान थीं वहाँ पहुँच गये। पुकारे व कहा कि यह मालिनि नन्दगाँच वाली आयी हुई है। जो ब्रजबाला मेरी माला को लेकर गले में पहन ले श्यामसुन्दर उसके अधीन हो जायेंगे। जो चाहे इस बात का अनुभव आज ही कर ले। किशोरी जी ने कहा, सुनो ललिता सखि! जाकर इस मालिन को लिवा लाओ। बस फिर क्या था मालिन अपने जाल से ललिता सखि के साथ किशोरी जी के महल के भीतर हुँच गयी। 'कृपालु' कहते हैं कि श्यामसुन्दर अत्यन्त छलिया एवं किशोरी जी अत्यन्त भोली-भाली हैं, इसी से छली गती हैं।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 509-510