लीला-माधुरी · पद 10
छुवो जनि, कान्ह मान लो बात।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: chhuvo jani, kānha! māna lo bāta
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1छुवो जनि, कान्ह मान लो बात।
2हम गोरी वृषभानु-किशोरी, तुम हो श्यामल गात।
3कारी ह्वै गइ कालिंदीहूँ, तुम्हरे न्हातहिं न्हात।
4यद्यपि तुम जानत, हौं मानति, हमरो तुम्हरो नात।
5तदपि छुवो जो ह्वै हौं कारी, सुबरन बरन नसात।
6सुबरन माहिं “कृपालु” कसौटिन, रंग न लागि सकात॥
हिन्दी भावार्थ
श्री किशोरी जी विनोद भरे शब्दों में श्यामसुन्दर से हती हैं कि हे श्यामसुन्दर! तुम मुझे मत छुओ, यह मेरी बात गान लो। मैं वृषभानुनन्दिनी गोरे रंग की हूँ और तुम नन्दनन्दन नाले रंग के हो। तुम्हारे नहाते-नहाते यमुना जी भी काली हो यी हैं। यद्यपि यह तुम भी जानते हो और मैं भी मानती हूँ कि मारा तुम्हारा हार्दिक पूर्ण प्रेम है फिर भी मुझे यह भय है कि दि तुम मुझे छुओगे तो मैं काली हो जाऊँगी एवं सुवर्ण के मान चमकता हुआ मेरा गोरा रंग नष्ट हो जायेगा। इतने ही में कृपालु, ने श्यामसुन्दर का पक्ष लेते हुए कहा कि हे किशोरी त्री! कसौटी में सुवर्ण का रंग लग सकता है किन्तु सुवर्ण में सौरी का रंग नहीं लग सकता। अतएव काले रंग की शंका होनी चाहिये।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 510