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RADHEY RADHEY

लीला-माधुरी · पद 11

युगलवर, जल विच करत विहार।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: yugalavara, jala bicha karata bihāra

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1युगलवर, जल विच करत विहार।

2जुरि गोरिन, जलजन भरि झोरिन, घेरि लई रिझवार।

3नैन-सैन लहि भानुलली को, सज्जित सखिन अपार।

4लै कर-कमल कोउ डरपावति, कोउ चुपके कर धार।

5कोउ धावति, कोउ घात लगावति, करि दृग-कमलन वार।

6खेलत दुरत भजत जल बिच हरि, बह्यो जाय मझधार।

7लखि कौतुक-विचित्र कालिंदिहुँ, रोक दई निज धार।

8यह “कृपालु” येहि जल विहार पर, बार बार बलिहार॥

हिन्दी भावार्थ

राधा-कृष्ण दोनों ही यमुना के जल में कीड़ा क रहे हैं। समस्त गोपियों के झुंड ने झोलियों में कमल भरः भरकर प्रियतम को घेर लिया एवं किशोरी जी के नेत्रां वे संकेत को पाकर समस्त ब्रज-गोपियाँ तैयार हो गयीं। को गोपी हाथ में कमल लेकर मारने के बहाने से डराती है, को गोपी चुपके से अपने हाथ में कमल का फूल लिये है, को श्यामसुन्दर का पीछा करती हुई दौड़ती है, कोई अभी अवस देख रही है, कोई परम चतुर गोरी अपने नेत्रों के कटाक्षपात र प्रियतम को प्रेम-विभोर करती है, एवं कोई मारने की प्रती में है। इस प्रकार श्यामसुन्दर कमल के फूलों का खेल खेल हुए कभी भागते हैं कभी जल में छिप जाते हैं, किन्तु ऐस करते ही करते श्यामसुन्दर यमुना की धारा में बहने लगे। ब्रह श्रीकृष्ण के इस विचित्र नाटक को देखकर यमुना ने अपन धारा को भी रोक दिया है। 'कृपालु' कहते हैं कि इस जलविहा के ऊपर मैं बार-बार बलिहार जाता हूँ।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 511-512