लोड हो रहा है…लोड हुँदैछ…
Skip to main content
RADHEY RADHEY

लीला-माधुरी · पद 12

देखु सखि, द्वै सावन सँग भाय।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: dekhu sakhi, dvai sāvana saṁga bhāya

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1देखु सखि, द्वै सावन सँग भाय।

2सावन महँ जनु तनु धरि सावन, रस बरसावन आय।

3इत सावन घनश्याम उतै जनु, तनु घनश्याम जनाय।

4इत सावन दामिनि दमकनि उत, पीत-वसन फहराय।

5इत सावन नभ इंद्र-धनुष उत, मणिगण मुकुट लखाय।

6इत सावन बरसावत जल उत, आनँद-जल बरसाय।

7इत सावन तृण हरित अवनि उत, काछनि हरित सुहाय।

8इत सावन दादुर धुनि उत पग, नूपुर शब्द सुनाय।

9दोउ “कृपालु” मनभावन सावन, हिलि मिलि भल छवि छाय॥

हिन्दी भावार्थ

अरी सखि! हे हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि एक सावन के महीने में दूसरा गवन मूर्तिमान बनकर आनन्द रस बरसाने आया है। आवन से अभिप्राय सावन मास से है एवं दूसरे सावन से अभिप्राय श्यामसुन्दर से है) इधर सावन मास में काले बादल और उधर काले बादलों के समान श्यामसुन्दर का शरीर है। धर सावन मास में बिजली चमक रही है उधर श्यामसुन्दर गा पीताम्बर फहरा रहा है। द्र धनुष चमक रहा है उधर श्यामसुन्दर के मुकुट में रंग रंगी मणियाँ चमक रही हैं। रस रहा है उधर श्यामसुन्दर के द्वारा दिव्यानन्द जल बरस हा है। इधर सावन मास में पृथ्वी पर हरी घास सुशोभित है (धर श्यामसुन्दर की कमर में हरी काछनी सुशोभित है। आवन मास में मेंढकों की ध्वनि हो रही है उधर श्यामसुन्दर के रणों ने शोभित नूपुर की मधुर ध्वनि है इस प्रकार चेतन एवं चेतन दोनों सावन मिलकर अनिर्वचनीय शोभा पा रहे हैं।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 512