# छुवो जनि, कान्ह मान लो बात।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0532-M12-K010
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: लीला-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 10
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 248–248

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>छुवो जनि, कान्ह मान लो बात।  
<a id="line-2"></a>हम गोरी वृषभानु-किशोरी, तुम हो श्यामल गात।  
<a id="line-3"></a>कारी ह्वै गइ कालिंदीहूँ, तुम्हरे न्हातहिं न्हात।  
<a id="line-4"></a>यद्यपि तुम जानत, हौं मानति, हमरो तुम्हरो नात।  
<a id="line-5"></a>तदपि छुवो जो ह्वै हौं कारी, सुबरन बरन नसात।  
<a id="line-6"></a>सुबरन माहिं “कृपालु” कसौटिन, रंग न लागि सकात॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

श्री किशोरी जी विनोद भरे शब्दों में श्यामसुन्दर से हती हैं कि हे श्यामसुन्दर! तुम मुझे मत छुओ, यह मेरी बात गान लो। मैं वृषभानुनन्दिनी गोरे रंग की हूँ और तुम नन्दनन्दन नाले रंग के हो। तुम्हारे नहाते-नहाते यमुना जी भी काली हो यी हैं। यद्यपि यह तुम भी जानते हो और मैं भी मानती हूँ कि मारा तुम्हारा हार्दिक पूर्ण प्रेम है फिर भी मुझे यह भय है कि दि तुम मुझे छुओगे तो मैं काली हो जाऊँगी एवं सुवर्ण के मान चमकता हुआ मेरा गोरा रंग नष्ट हो जायेगा। इतने ही में कृपालु, ने श्यामसुन्दर का पक्ष लेते हुए कहा कि हे किशोरी त्री! कसौटी में सुवर्ण का रंग लग सकता है किन्तु सुवर्ण में सौरी का रंग नहीं लग सकता। अतएव काले रंग की शंका होनी चाहिये।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 510

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## पद का स्रोत और उद्धरण

पद और उपलब्ध भावार्थ दिए गए स्रोत से लिप्यंतरित पाठ हैं। उद्धरण में स्रोत के शब्द, विराम-चिह्न और क्रम सुरक्षित रखें; लोप को स्पष्ट चिह्नित करें। सारांश या व्याख्या को अलग से अपना भावानुवाद बताकर इसी पद का संदर्भ दें। स्रोत में पूरे पद का भावार्थ है, शब्द-दर-शब्द या पंक्ति-दर-पंक्ति अर्थ नहीं। लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं।

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
