युगल-माधुरी · पद 23
हौं ह्वै गई प्रीतम प्यारी की।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: hauṁ hvai gai prītama pyārī kī
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1हौं ह्वै गई प्रीतम प्यारी की।
2धर्म अर्थ अरु काम, मोक्ष सुख, रुचि न तनिक इन चारी की।
3बलि बलि जात टहल करि महलन, प्यारी अरु बनवारी की।
4भावत टहल सबै पै अतिशय, भावत टहल बुहारी की।
5जब कर मान मानिनी तब चह, टहल महल-रखवारी की।
6कह “कृपालु” यह चाह, कहाऊँ, सखि बरसाने वारी की॥
हिन्दी भावार्थ
मैं तो प्रिया-प्रियतमं की दासी हो गई। अब मुझे धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष इन चारों पदार्थों की स्वप्न में भी इच्छा नहीं है। महल में प्रिया-प्रियतम की चाकरी करके बलिहार जाती हूँ। यद्यपि युगल सरकार की प्रत्येक सेवा प्रिय है, फिर भी बुहारी देने की सेवा अधिक प्रिय है। जब किशोरी जी मान करती हैं तब प्रियतम को रोकने के लिए महल की रक्षा की सेवा भी चाहती हूँ। 'कृपालु' कहते हैं-संक्षेप में मेरी एकमात्र यही अभिलाषा है कि मैं बरसाने वाली वृषभानुदुलारी की सखि कहलाउँ।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 499-500