# हौं ह्वै गई प्रीतम प्यारी की।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0522-M11-K023
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: युगल-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 23
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 242–242

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>हौं ह्वै गई प्रीतम प्यारी की।  
<a id="line-2"></a>धर्म अर्थ अरु काम, मोक्ष सुख, रुचि न तनिक इन चारी की।  
<a id="line-3"></a>बलि बलि जात टहल करि महलन, प्यारी अरु बनवारी की।  
<a id="line-4"></a>भावत टहल सबै पै अतिशय, भावत टहल बुहारी की।  
<a id="line-5"></a>जब कर मान मानिनी तब चह, टहल महल-रखवारी की।  
<a id="line-6"></a>कह “कृपालु” यह चाह, कहाऊँ, सखि बरसाने वारी की॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

मैं तो प्रिया-प्रियतमं की दासी हो गई। अब मुझे धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष इन चारों पदार्थों की स्वप्न में भी इच्छा नहीं है। महल में प्रिया-प्रियतम की चाकरी करके बलिहार जाती हूँ। यद्यपि युगल सरकार की प्रत्येक सेवा प्रिय है, फिर भी बुहारी देने की सेवा अधिक प्रिय है। जब किशोरी जी मान करती हैं तब प्रियतम को रोकने के लिए महल की रक्षा की सेवा भी चाहती हूँ। 'कृपालु' कहते हैं-संक्षेप में मेरी एकमात्र यही अभिलाषा है कि मैं बरसाने वाली वृषभानुदुलारी की सखि कहलाउँ।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 499-500

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
