युगल-माधुरी · पद 22
हमारो, दोउ प्यारी प्यारो।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: hamāro, dou pyārī pyāro
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1हमारो, दोउ प्यारी प्यारो।
2एक गौर तनु एक नील-तनु, दोउ नैननि-तारो।
3इक धारो नीलांबर अरु इक, पीतांबर धारो।
4इक सोरह श्रृंगारहिं छवि इक, नटवर-छवि वारो।
5इक भोरी अति इक अति चंचल, दोउ त्रिभुवन न्यारो।
6कह “कृपालु” जब होति होड़ तब, कोउ नहिं कोउ हारो॥
हिन्दी भावार्थ
प्रिया-प्रियतम दोनों ही हमारे सर्वस्व हैं। एक गौर वर्ण और एक नील वर्ण के हैं तथा दोनों ही मेरी आँखों के तारों के समान हैं। एक नीलाम्बर धारण किये हुए हैं एवं एक पीताम्बर धारण किये हुए हैं। एक सोलहों शृंगार से अलंकृत हैं एवं एक नटवर वेष से अलंकृत हैं। एक स्वभावतः अत्यन्त भोली हैं, और एक स्वभावतः अत्यन्त चंचल हैं। दोनों ही संसार से निराले हैं, क्योंकि दिव्य चिन्मय हैं। 'कृपालु' कहते हैं जब दोनों में किसी प्रकार की रसमयी होड़ हो जाती है तब कोई भी किसी से हार नहीं मानता क्योंकि स्वरूपतः, परमार्थत दोनों एक ही हैं।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 498