युगल-माधुरी · पद 21
हमारो, ठाकुर युगल किशोर।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: hamāro, ṭhākura yugalakishora
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1हमारो, ठाकुर युगल किशोर।
2दोउ श्रृंगार रूप रस सागर, दोउ रसिकन सिरमोर।
3दोउ कर नित्य रास वृंदावन, नित्य साँझ ते भोर।
4दोउ सेवक दोउ सेव्य परस्पर, दोउ चित दोउ चितचोर।
5दोउन मिलन लगत दोउन कहँ, पल-सम कलप करोर।
6दोउ “कृपालु” कोमल-कोमल पै, दोउ कह दोउ कठोर॥
हिन्दी भावार्थ
श्यामा-श्याम दोनों ही हमारे स्वामी हैं। दोनों ही अनुपमेय श्रृंगार एवं रूप तथा रस के समुद्र हैं। दोनों ही वृन्दावन में सांयकाल से प्रातःकाल तक नित्य रास करते हैं। दोनों ही एक दूसरे के सेवक हैं, दोनों ही एक दूसरे के सेव्य हैं एवं दोनों ही एक दूसरे के मन को हरण करने वाले हैं। दोनों को ही दोनों के परस्पर मिलन में इतना सुख मिलता है कि करोड़ों कल्प भी एक पल के समान लगता है। 'कृपालु' कहते हैं यद्यपि दोनों ही कोमलता से भी अधिक कोमल हैं तथापि दोनों ही दोनों को अटपटी रसमयी भाषा में "कठोर कहते हैं।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 497