युगल-माधुरी · पद 20
हमारे माई, गौर श्याम दुइ आँखी।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: hamāre māī, gaura shyāma dui āṁkhī
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1हमारे माई, गौर श्याम दुइ आँखी।
2गौर तेज, तिल श्याम पलक पुनि, रस-विलास-हित राखी।
3माया-पलक-विलास होत हम, तलफति दृग-जल साखी।
4बिनु वियोग, संयोग सुखद कम, रसिक-जनन यह भाखी।
5सोइ रस प्रेम विषामृत जानत, जो बारेक रह चाखी।
6चाखे पुनि “कृपालु” नित नव-रस, रह चाखन अभिलाखी॥
हिन्दी भावार्थ
अरी मैया! हमारे तो श्यामा-श्याम रूप ही दे हैं। आँखों में तेज (ज्योति) स्वरूपा राधिकाजी हैं, एव काले तिल रूपी श्यामसुन्दर हैं। इन दोनों को बड़े प्रयत्न रे पलकों से ढाँक कर रखा है। थोड़ा भी उनके पलकों से ओः होते ही तड्पते हैं। आँखों के आँसू इसके साक्षी हैं। रसिक का यह सिद्धान्त है कि वियोग के बिना संयोग सुखप्रद नहीं होता। इस प्रेम-विषामृत-रस को वही जानता है जिसने एक बार चख लिया है। 'कृपालु' कहते हैं कि एक बार भी चख लेने पर वह नित्य के लिए दीवाना बन जाता है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 496-497