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RADHEY RADHEY

युगल-माधुरी · पद 17

सखी सुनु, प्रिया पियहिं इक बात।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: sakhī sunu, priyā piyahiṁ ika bāta

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1सखी सुनु, प्रिया पियहिं इक बात।

2दोउन हमरो ठाकुर दोउन, प्रानन-प्यारो नात।

3पै दोउन महँ कौन बड़ो सखि, यह नहिं सोचि सकात।

4जब पिय सों पूछति सो प्यारिहिं, गुन गावत न अघात।

5जब प्यारिहिं पूछति सोउ पिवु को, गुन अगनित गनि जात।

6कह “कृपालु” जब दोउ इक तब कत, सखि! इत मति भरमात॥

हिन्दी भावार्थ

एक सखि कहती है—अरी सखि! प्रिया-प्रियतम की एक विलक्षण बात सुन। यद्यपि दोनों ही मेरे स्वामी हैं एवं दोनों ही से मेरा प्राणप्यारा नाता है, तथापि मैं यह निश्चय नहीं कर पाती कि इन दोनों में कौन अधिक सरस है। जब 'प्यारी' से पूछती हूँ तब प्यारी प्रियतम के अगणित गुण गाने लगाती हैं एवं जब प्रियतम से पूछती हूँ तब वे भी प्यारी जी की प्रशंसा के पुल बाँध देते हैं। 'कृपालु' कहते हैं—''अरी सखि! इन दोनों के शरीर ही दो हैं, शेष सब बातें एक ही हैं। तू व्यर्थ ही खोपड़ी लगाकर क्यों चिन्तित होती है?''

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 494