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RADHEY RADHEY

युगल-माधुरी · पद 18

हम चाकर प्रीतम प्यारी के।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: hama chākara prītama pyārī ke

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1हम चाकर प्रीतम प्यारी के।

2वृंदाविपिन बिहारी के, अरु श्री-बरसाने वारी के।

3पास न फटकत महाविष्णु के, अरु उनकी घरवारी के।

4चिन्मय दिव्य धाम वृंदावन, विहरत संग बिहारी के।

5कबहुँक रहत पक्ष प्यारी के, कबहुँ पक्ष बनवारी के।

6परत न जाल “कृपालु” भूलिहूँ, मुक्ति पिशाचिनि नारी के॥

हिन्दी भावार्थ

हम केवल गौर-श्याम सरकार के ही दास हैं वृन्दावन विहारी श्यामसुन्दर एवं बरसाने वाली किशोरी जी ही हमारी सर्वस्व हैं। हम महाविष्णु एवं उनकी अर्धांगिनी महालक्ष्मी के पास तक नहीं फटकते। दिव्य चिन्मय वृन्दावन धाम में श्यामसुन्दर के साथ हम नित्य विहार करते हैं। हम कभी तो किशोरी जी के पक्ष में हो जाते हैं एवं कभी श्यामसुन्दर के पक्ष में हो जाते हैं। 'कृपालु' कहते हैं कि हम मुक्ति रूपी डाकिनी के जाल से मुक्त हैं।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 495