युगल-माधुरी · पद 14
युगलवर, ठाढ़ो कुंज लतान।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: yugalavara, ṭhād̤ho kuñja latāna
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1युगलवर, ठाढ़ो कुंज लतान।
2नथवारी वृषभानुदुलारी, मुरली वारो कान्ह।
3लखतहिं बनत जुगल जोरी की, मधुर मधुर मुसकान।
4गलबाहीं दीने रँग-भीने, नैनन कीने बान।
5करति निछावर प्राण सखिन लखि, प्रेम-रूप-रस-खान।
6मन मोहन “कृपालु” मन मोहिनि, टेरत मुरली तान॥
हिन्दी भावार्थ
युगल सरकार श्यामा श्याम लताओं के कुंज में खड़े हैं। वृषभानुनन्दिनी की नथ की शोभा एवं श्यामसुन्दर की मुरली की शोभा सर्वाधिक आकर्षक है। श्यामा श्याम की मुसकान तो बस देखते ही बनती है। दोनों ही प्रेम रंग में सराबोर गलबाहीं दिये हुए, एक दूसरे पर प्रेमरस भरे कटाक्षपात करते हैं। प्रेम, रूप एवं रस के भण्डार इन युगल सरकार को देख कर सखियाँ अपना सर्वस्व न्यौछावर करती हैं। 'कृपालु' कहते हैं कि मनमोहन श्यामसुन्दर मनमोहिनी मुरली की तान भी छेड़ रहे हैं।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 492