युगल-माधुरी · पद 13
युगलवर, उरझनि की बलिहार।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: yugalavara, urajhani kī balihāra
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1युगलवर, उरझनि की बलिहार।
2उरझ्यो मुकुट मुकुट सों अटपट, लट सों लट घुँघरार।
3करणफूल कुंडल सों, नथ सों, बेसर सुघर निहार।
4नीलांबर सों पीतांबर अरु, गर हारन सों हार।
5कर सों कर, पग सों पग दोउन, दृग सों दृग रतनार।
6जब “कृपालु” दोउ उर उरझानो, को सुरझावनहार॥
हिन्दी भावार्थ
युगल सरकार के परस्पर उलझने पर मैं बलिहा जाता हूँ। दोनों के मुकुट अनोखे ढंग से उलझे हुए हैं। दोन की घुँघराली लटें परस्पर उरझी हुई हैं। कुण्डल से कर्णफूर एवं नथ में बेसर उलझी हुई है। नीलाम्बर से पीताम्बर एवं हार से हार उलझे हुए हैं। गलबाहीं दिये हुए हाथों में हाथ, पैरों से पैर एवं आँखों से आँखें उलझी हुई हैं। 'कृपालु' कहते हैं कि उपर्युक्त उलझनों को सुलझाना संभव है, किन्तु जब दोनों के मन भी परस्पर उलझे हुए हैं तो उसे कौन सुलझा सकता है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 491-492