युगल-माधुरी · पद 12
युगल छवि, देखि गई बलिहार।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: yugala chhavi, dekhi gaī balihāra
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1युगल छवि, देखि गई बलिहार।
2मोर-मुकुट कटि तट पीतांबर, भ्राजति भानुदुलार।
3कनक-मुकुट कटि तट नीलांबर, राजत नंदकुमार।
4वेणी खुली हार उत गुंजन, केसर खौरि लिलार।
5वेणी गुथी हार इत मोतिन, बिंदी अति अरुणार।
6उत हलकत कुंडल इत झलकत, करणफूल छविदार।
7पै “कृपालु” उत गौर-श्याम इत, श्याम-गौर सरकार॥
हिन्दी भावार्थ
आज युगल सरकार के विपरीत शृंगार की छवि क देखकर मैं बलिहार गयी। श्री किशोरी जी सिर पर मोर मुकुः एवं कटि में पीताम्बर पहने हुए हैं। श्यामसुन्दर सिर पर सुवण का मुकुट एवं कटि में नीलाम्बर पहने हुए हैं। उधर किशोरं जी की वेणी खुली हुई है। गले में गुंजमाला लटक रही है, एव ललाट पर केशर की खौर सुशोभित है। इधर श्यामसुन्दर क वेणी गुंथी हुई है, मोतियों के हार पहने हुए हैं एवं ललाट लाल बिन्दी सुशोभित है। श्यामसुन्दर कान में कर्णफूल पहः हैं एवं किशोरी जी कान में कुण्डल पहने हैं। 'कृपालु' कहः हैं कि यह सब होते हुए भी श्यामसुन्दर गौरांगी नहीं बन सबे एवं किशोरी जी श्यामल गात नहीं बन सकीं।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 490-491