युगल-माधुरी · पद 11
युगल गल बँहियन की बलिहार।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: yugala galabaṁhiyana kī balihāra
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1युगल गल बँहियन की बलिहार।
2छवि श्रृंगार सखी! का कहनो, लजवत"छवि""श्रृंगार"।
3बैठे महल युगल सिंहासन, आरति सखिन उतार।
4कबहुँक लखत सखिन कहँ कबहुँक, एकहिं एक निहार।
5लखतहिं बनत युगल मुसकनि छवि, अगनित"छवि"छवि वार।
6कहत “कृपालु” निहार बार-इक, मोरेहुँ ढिंग सरकार॥
हिन्दी भावार्थ
युगल सरकार की परस्पर गलबाहीं डाले मनोहर म्ॉँकी अनिर्वचनीय है। उनकी छवि एवं उनके श्रृंगार के विषय में इतना ही कहना पर्याप्त है कि मूर्तिमान छवि एवं युंगार भी लज्जित होते हैं। दोनों महल में सिंहासन पर पमासीन हैं एवं सखियाँ आरती उत्तार रही हैं। दोनों कभी तो र एक दूसरे को देखते हैं एवं कभी सखियों की ओर भी देख लेते हैं। युगल सरकार की प्रेम रस भीनी मधुर पुस्कान की छवि बस देखते ही बनती है। इतना ही कहना र्याप्त है कि उस छवि पर अनन्त 'छवि'की छवि न्यौछावर की जा सकती है। 'कृपालु' कहते हैं-हे युगल-सरकार!! एक शार मेरी ओर भी अपनेपन से निहार दो।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 490