युगल-माधुरी · पद 10
बसे रे मेरे, नैनन दोउ सरकार।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: base re mere, nainana dou sarakāra
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1बसे रे मेरे, नैनन दोउ सरकार।
2गरबाहीं दीने रँग-भीने, छीने छवि-श्रृंगार।
3रस मुरली ने अस सुख दीने, कीने बस ब्रजनार।
4हँसनि दसन, दृग फँसनि गँसनि अस, रसनि कस न बलिहार।
5दै सरबस बरबस रस-बस ह्वै, बस रस-रास मझार।
6जित “कृपालु” चितवति तित तिनहिंन, चितवति गति-मतिहार॥
हिन्दी भावार्थ
मेरी आँखों में युगल-सरकार बस गये हैं। परस्पर गलबाहीं दिये हुए प्रेम रस सराबोर छवि एवं श्रृंगार की भी छवि को चुरा रहे हैं। मधुर मुरली की सुरीली तान ने ब्रजांगनाओं को इतना सुख दिया है कि वे सब आत्मविस्मृत हैं। उनके मन्द-मन्द हँसने एवं नुकीले नेत्रों के कटाक्ष के रस के वशीभूत होकर ऐसा कौन जीव है जो उस रस में बलिहार न जाय। जो बलिहार गया, अपना सर्वस्व समर्पित कर दिया, पुनः युगल सरकार के कृपाकटाक्ष से उस रस के वशीभूत हो सर्वदा नित्य रास में अलौकिक रस पाता है। 'कृपालु' कहते हैं सखि जिस ओर भी देखती हैं श्यामसुन्दर एवं किशोरी जी को देखती हैं और मन-बुद्धि से जगत् की चेतना से परे दिव्य चेतना युक्त रसपान करती हैं।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 489