# बसे रे मेरे, नैनन दोउ सरकार।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0509-M11-K010
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: युगल-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 10
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 236–237

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>बसे रे मेरे, नैनन दोउ सरकार।  
<a id="line-2"></a>गरबाहीं दीने रँग-भीने, छीने छवि-श्रृंगार।  
<a id="line-3"></a>रस मुरली ने अस सुख दीने, कीने बस ब्रजनार।  
<a id="line-4"></a>हँसनि दसन, दृग फँसनि गँसनि अस, रसनि कस न बलिहार।  
<a id="line-5"></a>दै सरबस बरबस रस-बस ह्वै, बस रस-रास मझार।  
<a id="line-6"></a>जित “कृपालु” चितवति तित तिनहिंन, चितवति गति-मतिहार॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

मेरी आँखों में युगल-सरकार बस गये हैं। परस्पर गलबाहीं दिये हुए प्रेम रस सराबोर छवि एवं श्रृंगार की भी छवि को चुरा रहे हैं। मधुर मुरली की सुरीली तान ने ब्रजांगनाओं को इतना सुख दिया है कि वे सब आत्मविस्मृत हैं। उनके मन्द-मन्द हँसने एवं नुकीले नेत्रों के कटाक्ष के रस के वशीभूत होकर ऐसा कौन जीव है जो उस रस में बलिहार न जाय। जो बलिहार गया, अपना सर्वस्व समर्पित कर दिया, पुनः युगल सरकार के कृपाकटाक्ष से उस रस के वशीभूत हो सर्वदा नित्य रास में अलौकिक रस पाता है। 'कृपालु' कहते हैं सखि जिस ओर भी देखती हैं श्यामसुन्दर एवं किशोरी जी को देखती हैं और मन-बुद्धि से जगत् की चेतना से परे दिव्य चेतना युक्त रसपान करती हैं।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 489

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## पद का स्रोत और उद्धरण

पद और उपलब्ध भावार्थ दिए गए स्रोत से लिप्यंतरित पाठ हैं। उद्धरण में स्रोत के शब्द, विराम-चिह्न और क्रम सुरक्षित रखें; लोप को स्पष्ट चिह्नित करें। सारांश या व्याख्या को अलग से अपना भावानुवाद बताकर इसी पद का संदर्भ दें। स्रोत में पूरे पद का भावार्थ है, शब्द-दर-शब्द या पंक्ति-दर-पंक्ति अर्थ नहीं। लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं।

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
