युगल-माधुरी · पद 7
बनी कस जोरी युगल-किशोर।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: banī kasa, jorī yugala-kishora
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1बनी कस जोरी युगल-किशोर।
2गरबाहीं दीने रस-भीने, छीने ले मन मोर।
3श्याम गौर-दृग गौर श्याम-दृग, चितवत दृग की कोर।
4श्यामल-मुख दुति गौर गौर मुख, श्यामल दुति चितचोर।
5पीत बसन तनु नील इतै उत, नील-बसन तनु गोर।
6कह “कृपालु” सखि देहु दिठौना, दीठि दुहुँन बरजोर॥
हिन्दी भावार्थ
श्याम-गौर सरकार की मनोहर जोड़ी अनिर्वचनीय है। दोनों एक-दूसरे के गले में बाँह डाले हुए हैं। दोनों दिव्य प्रेम रस में सराबोर हैं एवं दोनों बरबस मेरे मन को वश में किये ले रहे हैं। श्यामसुन्दर किशोरी जी की आँखों की चितवनि को एवं किशोरी जी श्यामसुन्दर की आँखों की चितवनि को तिरछी चितवन से देख रहे हैं। श्यामसुन्दर के मुख की नील कान्ति किशोरी जी के मुख पर पड़ रही है एवं किशोरी जी के मुख की पीत-कान्ति श्यामसुन्दर के मुख पर पड़ रही है श्यामसुन्दर के नीले रंग के शरीर पर पीले रंग का वस्त्र सुशोभित है एवं किशोरी जी के गौर वर्ण के शरीर पर नीले रंग का वस्त्र सुशोभित है। युगल-सरकार की रूप-माधुरी को पान करने वाली सखि से 'कृपालु' कहते हैं अरी सखि! दोनों को आँखों की चितवनि खतरनाक है ठ दिठौना लगा दे ताकि दोनों को दीठि न लगे।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 486-487