युगल-माधुरी · पद 6
धरो मन! युगल माधुरी ध्यान।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: dharo mana! yugala mādhurī dhyāna
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1धरो मन! युगल माधुरी ध्यान।
2मनमोहन मोहिनि श्यामा अरु, मोहिनि मोहन कान्ह।
3इन दोउन कहँ विलग न मानिय, द्वै देही इक प्रान।
4पै लीला-विलास मँह मोहन, अनुचर रसिक प्रमान।
5रिझवत नित निकुंज श्यामा कहँ, मरम न सक कोउ जान।
6यह “कृपालु” रस रसिकहिं जानत, जो नित कर रह पान॥
हिन्दी भावार्थ
अरे मन! तू प्रिया-प्रियतम की रूपमाधुरी का निरंतर ही ध्यान किया कर। श्यामसुन्दर को मोहित करने वाली किशोरी जी एवं किशोरी जी को मोहित करने वाले श्यामसुन्दर हैं। मन! इन दोनों को भिन्न न समझना, इन दोनों के देह तो दो अवश्य हैं किन्तु प्राण एक ही हैं। हाँ! अनुसार लीला-विलास के क्षेत्र में श्यामसुन्दर दास अवश्य हैं तथा नित्य ही निकुंजों के मध्य में विविध प्रकार से किशोरी र को रिझाया करते हैं। कोई भी नहीं जान सकता। स-माधुरी को रसिक ही जानते हैं, जो कि इस रस का निरन्तर ही पान किया करते हैं।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 486