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RADHEY RADHEY

युगल-माधुरी · पद 1

अनूपम, जोरी श्यामा श्याम।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: anūpama, jorī shyāmā shyāma

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1अनूपम, जोरी श्यामा श्याम।

2इक सोरह सिंगार सजीं इक, नटवर भेष ललाम।

3गलबाहीं दै दोउ वृंदावन, विहरत आठों याम।

4पुंज निकुं जनि मंजु रास-रस, खेलत पूरनकाम।

5सनक समाधि छाँड़ि सनकादिक, बने विटप ब्रजधाम।

6आत्माराम “कृपालु” श्याम की, आत्मा श्यामा नाम॥

हिन्दी भावार्थ

श्यामा-श्याम की युगल जोड़ी सर्वथा अनुपमेय है। किशोरी जी ने अपना सोलह शृंगार कर रखा है एवं श्यामसुन्दर ने नटवर भेष बना रखा है। दोनों ही गलबाहीं दिये हुए वृन्दावन में निरन्तर विहार करते हैं। श्यामा-श्याम पूर्णकाम होते हुए भी सुन्दर लता कुंजों में रास-रस खेलते हैं। जिसको देखने के सनकादिक परमहँस अपनी समाधि की सनक छोड़कर ब्रज में वृक्ष बने हुए हैं। 'कृपालु' कहते हैं कि आत्माराम ब्रह्म श्यामसुन्दर की आत्मा ही 'श्यामा' नाम से अलंकृत हैं।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 482