युगल-माधुरी · पद 2
अनोखी, पिय प्यारी की बात।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: anokhī, piya-pyārī kī bāta
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1अनोखी, पिय प्यारी की बात।
2समुझि सकी नहिं बात सखी! यह, सोचि थकी दिन-रात।
3जब पिय कहँ देखहुँ तब पिय मोहिं, प्यारिहुँ-सरस लखात।
4जब प्यारिहिं देखहुँ तब प्यारिहुँ, पिय ते सरस जनात।
5पुनि इन दुहुँन लखहुँ जिन अंगनि, तिनहिंन रस अधिकात।
6कह “कृपालु” दोउ चिन्मय याते, नित नव रस सरसात॥
हिन्दी भावार्थ
प्रिया-प्रियतम के वैलक्षण्य से विस्मित होकर एक कहती है-''अरी सखि! प्रिया-प्रियतम की अटपटी अलौकिक गति बुद्धि में नहीं समाती। बुद्धि द्वारा मैं दिन रात विचार करके थक गई किन्तु यह बात नहीं समझ सकी। अरी सखि! बात यह है कि जब मैं प्रियतम को देखती हूँ तब प्रियतम, प्यारी जी से भी अधिक सरस प्रतीत होते हैं और जब प्यारी जी को देखती हूँ तब प्यारी, प्रियतम से भी अधिक सरस लगती हैं। इतना ही नहीं इन दोनों के जिन अंगों को देखती हूँ, उन्हीं अंगों को अन्य अंगों से अधिक सरस अनुभव करती हूँ''। 'कृपालु' कहते हैं-अरी सखि! इसका रहस्य यह है कि दोनों दिव्य चिन्मय देह वाले हैं। अतएव प्रतिक्षण वर्धमान नित्य-नवीन रस की अनुभूति होना स्वाभाविक ही है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 483