श्रीराधा-माधुरी · पद 57
हमारी, स्वामिनि भानुदुलार।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: hamārī, swāmini bhānudulāra
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1हमारी, स्वामिनि भानुदुलार।
2जाकी निशि-दिन करत खवासी, सगुण ब्रह्म साकार।
3गौर बदन लखि मदन-मोहनहुँ, सुधि बुधि देइ बिसार।
4लली मिलन लगि ललितादिहुँ की, करत रहत मनुहार।
5मुकुट उतारि धरत पग ऊपर, मानिनि मान निहार।
6लखि “कृपालु” झाँकी बाँकी यह, करत प्रान बलिहार॥
हिन्दी भावार्थ
हमारी स्वामिनी एकमात्र वृषभानुनन्दिनी ही हैं। जिनकी उपासना सगुण साकार ब्रह्म श्यामसुन्दर दिन-रात किया करते हैं। गौर रंग वाली किशोरी जी को देखकर मदन मोहन भी अपनी सुधि-बुधि भूल जाते हैं एवं श्री किशोरी जी से मिलने के लिये ललितादिक सखियों की चाटुकारी किया करते हैं, रूठी हुई किशोरी जी को मजाने के लिये अपना मुकुट उतार कर उनके चरणों पर रखते हैं। कि हम इस मनोहर झाँकी को देखकर अपना प्राण न्यौछावर करते हैं।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 479-480