लोड हो रहा है…लोड हुँदैछ…
Skip to main content
RADHEY RADHEY

श्रीराधा-माधुरी · पद 56

हमारी श्यामा, रसिकन-मुकुट-मनी।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: hamārī shyāmā, rasikana-mukuṭa-manī

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1हमारी श्यामा, रसिकन-मुकुट-मनी।

2इन्द्राणी, रुद्राणी, वाणी, जेतिक मणिरमनी।

3रूपध्यान साधे आराधे, राधे गजगमनी।

4ब्रज महँ अस ब्रजरस बरसावति, लजत विकुंठ धनी।

5भृकुटि-विलास लखत कमलापति, किमि कमला कमनी।

6सोइ “कृपालु” वनचरिन बनायो, प्रानसखी अपनी॥

हिन्दी भावार्थ

हमारी किशोरी जी समस्त रसिकों के शिरोमणि की भी शिरोमणि हैं। इन्द्राणी, पार्वती, सरस्वती इत्यादि जितनी भी श्री-शिरोमणि-रत्न हैं, वे सब रूपध्यान करते हुए हमारी किशोरी जी की निरन्तर उपासना करती हैं। हमारी किशोरी जी ब्रज में ब्रजांगनाओं के साथ ऐसा दिव्यरस बरसाती हैं कि उसे देखकर बैकुण्ठ के स्वामी महाविष्णु भी लज्जित हो जाते हैं। महालक्ष्मी की तो गणना ही क्या है, महालक्ष्मी के स्वामी महाविष्णु भी भयभीत होकर किशोरी जी के भृकुटि-विलास को देखते रहते हैं। 'कृपालु' कहते हैं वही किशोरी जी अकारण-करुण स्वभाव के कारण अशिक्षित बनचारियों को अपनी प्राणसखि बनाकर नित्य-रास में नित्य स्थान देती हैं।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 478-479