श्रीराधा-माधुरी · पद 55
हमारी राधे, रसिकनि-जीवन-मूरि।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: hamārī rādhe, rasikani-jīvana-mūri
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1हमारी राधे, रसिकनि-जीवन-मूरि।
2रसिक शिरोमणि श्यामहुँ याचत, जिन के पग की धूरि।
3ललीचरन चापन हित आपन, भाग मनावत भूरि।
4पल पल कलप लखात ललिहिं गये, पलक-ओटहूँ दूरि।
5गहवर-मंजु-निकुंजनि-पुंजनि, रस बरसत भरपूरि।
6लखि “कृपालु” बलि जात सरस रस, ज्ञानी रहे बिसूरि॥
हिन्दी भावार्थ
एक रसिक सखि कहती है कि हमारी स्वामिनी श्री वृषभानुनंदिनी रसिक जनों की जीवन-स्वरूपा हैं। जिनके चरणों की धूल को साक्षात् ब्रह्म श्रीकृष्ण भी चाहते हैं। श्रीकृष्णजी, श्रीराधिका जी के चरणों को दबाने में अपना अहोभाग्य समझते हैं तथा उनके बिना एक पल भी नहीं रह सकते। एक क्षण को भी जब राधिका जी आँखों से ओट हो जाती हैं तब श्रीकृष्ण को वह क्षण कल्प के समान प्रतीत होता है। गह्वरवन की सुन्दर कुंजों में निरन्तर प्रेम रास-रस बरसता रहता है, अर्थात् उपर्युक्त प्रकार से किशोरी जी की सेवा ब्रह्म श्रीकृष्ण करते रहते हैं। जिसे देखकर 'कृपालु' कहते हैं कि हम तो बलि-बलि जाते हैं किन्तु आत्माराम, पूर्णकाम, परमहंस ज्ञानी लोग आश्चर्य में पड़कर सोचने लगते हैं कि अरे! यह क्या हो रहा है? परात्पर-ब्रह्म भी राधिका जी के चरण दबा रहा है-'यह क्या जादू है?
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 477-478