श्रीराधा-माधुरी · पद 54
हमारी राधे, निराधार आधार।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: hamārī rādhe, nirādhāra ādhāra
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1हमारी राधे, निराधार आधार।
2पतितन ही को देति प्रेमधन, पतितन की रिझवार।
3दीन जनन ही प्यार करति नित, दीनबंधु सरकार।
4सहि न सकति क्रंदन पुनि अधमनि, अधम-उधारनि हार।
5आये शरण प्राण सम राखत, शरणागत रखवार।
6हम “कृपालु” सरकार भरोसे, सोवत पाँव पसार॥
हिन्दी भावार्थ
हमारी किशोरी जी निरवलम्ब की अवलम्ब हैं। उनकी पतितपावनता की बान इसी से स्पष्ट है कि वे अपने को पतित मानने वाले को ही, दिव्य प्रेमदान प्रदान करती हैं। उनकी दीनबन्धुता इसी से सिद्ध है कि वे अपने को दीन मानने से ही, प्यार करती हैं। उनकी अधमोद्धारिणी बान का यही परिचय है कि वे अपने को अधम मानने वाले की करुण-पुकार को सुन तक नहीं सकतीं, अर्थात् विहल हो जाती हैं। उनके शरणागत-रक्षण के स्वभाव का ज्चलन्त प्रमाण यह है कि वे शरणागत की अपने प्राण के समान रक्षा करती हैं। 'कृपालु' कहते हैं कि हम तो उन्हीं के शरणापन्न होकर शुभाशुभ कर्म से अवकाश पाकर सदा निश्चिन्त रहते हैं।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 477